सुभद्रा कुमारी चौहान की जीवनी।Subhadra Kumari Chauhan Biography in hindi | subhadra kumari chauhan Wikipedia

 सुभद्रा कुमारी चौहान की जीवनी।Subhadra Kumari Chauhan Biography in hindi | subhadra kumari chauhan Wikipedia 

Subhadra kumari chauhan

सुभद्रा कुमारी चौहान का जीवन परिचय ,जयंती ,की जीवनी ,इतिहास ,कहानी ,कविताये ,बेटा ,पति ,अवार्ड (Subhadra Kumari Chauhan Biography In Hindi,history ,Age, poems in hindi,Height, son ,Husband ,Caste, family ,Career, award )

सुभद्रा कुमारी चौहान एक भारतीय कवयित्री थीं, जिनकी रचनाएँ बहुत भावनात्मक रूप से आवेशित होती थीं। उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना झाँसी की रानी है जो बहादुर झाँसी की रानी, ​​लक्ष्मी बाई के जीवन का वर्णन करती है।

संपूर्ण हिंदी साहित्य में, यह वह कविता है जिसे भारत के लोगों द्वारा सबसे अधिक गाया जाता है। भारत सरकार ने उनकी याद में एक भारतीय तट रक्षक जहाज का नाम रखा है।

नाम (Name)सुभद्रा कुमारी चौहान
प्रसिद्द (Famous for )कवि होने के नाते झाँसी की रानी’ ‘मुकुल’ ‘त्रिधारा’ कविताओं के लिए
जन्म तारीख (Date of birth)16 अगस्त, 1904
जन्म स्थान (Place of born )निहालपुर, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश
गृहनगर (Hometown )जबलपुर , मध्य प्रदेश
मृत्यु तिथि (Date of Death )15 फरवरी, 1948
मृत्यु का स्थान (Place of Death) सिवनी जिला , मध्य प्रदेश
मृत्यु का कारण (Death Cause)कार दुर्घटना में मुत्यु
उम्र( Age)43 वर्ष (मृत्यु के समय )
शिक्षा (Education)नौवीं कक्षा पास
स्कूल  (School)क्रॉस्थवेट गर्ल्स स्कूल
पेशा (Profession)  लेखक
प्रसिद्द रचनायेझाँसी की रानी’ ‘मुकुल’ ‘त्रिधारा’
आँखों का रंग (Eye Color)काला
बालो का रंग( Hair Color)काला
धर्म (Religion) हिन्दू
नागरिकता(Nationality)भारतीय
वैवाहिक स्थिति (Marital Status)  शादीशुदा

सुभद्रा कुमारी चौहान का प्रारंभिक जीवन ( Subhadra Kumari Chauhan  Early life )

सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त, 1904 में उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले के निहालपुर गाँव में एक संपन्न परिवार में हुआ था । वह जमींदार परिवार से ताल्लुक रखती थी। उनके पिता का नाम दिलीप चौहान था।

सुभद्रा कुमारी का विद्यार्थी जीवन प्रयाग में गुजरा। उनको बचपन से ही हिंदी साहित्य की कविताये ,रचनाये पढ़ने में बहुत मज़ा आता था। सुभद्रा की सबसे अच्छी दोस्त महादेवी वर्मा थी जो सुभद्रा की तरह की कविताये लिखती थी और प्रसिद्द कवयित्री थीं।



सुभद्रा कुमारी चौहान की शिक्षा (Subhadra Kumari Chauhan Education)

उन्होंने शुरू में इलाहाबाद के क्रॉस्थवेट गर्ल्स स्कूल में पढ़ाई की और 1919 में मिडिल-स्कूल की परीक्षा पास की। उसी वर्ष खंडवा के ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान से शादी के बाद, वह जबलपुर चली गईं।

सुभद्रा कुमारी चौहान का परिवार (Subhadra Kumari Chauhan Family)

पिता का नाम (Father’s Name)ठाकुर रामनाथ सिंह
पति का नाम (Husband ’s Name)ठाकुर लक्ष्मण सिंह
बेटियों का नाम (Daughter ’s Name)सुधा चौहान और ममता चौहान
बेटों के नाम (Son ’s Name)अजय चौहान, विजय चौहान और अशोक चौहान

सुभद्रा कुमारी चौहान की शादी (  Subhadra Kumari Chauhan Marriage )


सुभद्रा कुमारी की शादी बहुत ही कम उम्र में हो गयी थी। साल 1919 में जब सुभद्रा मात्र सोलह साल की थी तब उनकी शादी मध्यप्रदेश राज्य में खंडवा जिले के रहने वाले ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान से कर दी गयी। शादी के बाद सुभद्रा कुमारी मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर में आ गयी।

शादी के बाद सुभद्रा कुमारी के पांच बच्चे हुए जिनका नाम सुधा चौहान, अजय चौहान, विजय चौहान, अशोक चौहानत और ममता चौहान था। उनकी बेटी सुधा चौहान की शादी प्रेमचंद के बेटे अमृतराय से हुई थी , सुधा चौहान ने अपनी माँ की जीवनी लिखी थी जिसका नाम था ‘मिले तेज से तेज’।

सुभद्रा कुमारी चौहान का करियर ( Subhadra Kumari Chauhan Writing career)


सुभद्रा कुमारी चौहान बहुत ही उत्तम दर्जे की महान कवयित्री थी और इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है की जब उनकी उम्र केवल नौ साल थी तब उन्होंने एक कविता ”नीम” लिखी थी और उनकी इस कविता को पत्रिका ”मर्यादा”ने प्रकाशित किया था।

सुभद्रा को बचपन से ही कविताये लिखने का शौक था लेकिन उस समय कविता लिखने के पैसे न मिलने के कारण उन्होंने कविताओं के साथ साथ कहानियाँ लिखना भी शुरू कर दिया था ताकि कहानियो के बहाने से पैसे कमा सके।

उन्होंने अपने जीवनकाल में कई कविताये लिखी ,उनकी सबसे ज्यादा प्रसिद्द कविता ” झाँसी की रानी” है, सुभद्रा कुमारी ने रानी लक्ष्मी बाई की जिंदगी के बारे में बताते हुए बहुत ही बढ़िया ढंग से कविता लिखी।

झाँसी की रानी

”सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी”।

सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताओं में सबसे प्रसिद्ध कविता है – “बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।” 

आइए पढ़ते हैं महान कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान जी की कविताएं, famous poems of Subhadra Kumari Chauhan in hindi, Subhadra Kumari Chauhan Poetry in hindi.

स्मृतियाँ ~ Subhadra Kumari Chauhan poems

क्या कहते हो? किसी तरह भी

भूलूँ और भुलाने दूँ?

गत जीवन को तरल मेघ-सा

स्मृति-नभ में मिट जाने दूँ?


शान्ति और सुख से ये

जीवन के दिन शेष बिताने दूँ?

कोई निश्चित मार्ग बनाकर

चलूँ तुम्हें भी जाने दूँ?

कैसा निश्चित मार्ग? ह्रदय-धन

समझ नहीं पाती हूँ मैं

वही समझने एक बार फिर

क्षमा करो आती हूँ मैं।


जहाँ तुम्हारे चरण, वहीँ पर

पद-रज बनी पड़ी हूँ मैं

मेरा निश्चित मार्ग यही है

ध्रुव-सी अटल अड़ी हूँ मैं।


भूलो तो सर्वस्व ! भला वे

दर्शन की प्यासी घड़ियाँ

भूलो मधुर मिलन को, भूलो

बातों की उलझी लड़ियाँ।

 

भूलो प्रीति प्रतिज्ञाओं को

आशाओं विश्वासों को

भूलो अगर भूल सकते हो

आंसू और उसासों को।


मुझे छोड़ कर तुम्हें प्राणधन

सुख या शांति नहीं होगी

यही बात तुम भी कहते थे

सोचो, भ्रान्ति नहीं होगी।


सुख को मधुर बनाने वाले

दुःख को भूल नहीं सकते

सुख में कसक उठूँगी मैं प्रिय

मुझको भूल नहीं सकते।


मुझको कैसे भूल सकोगे

जीवन-पथ-दर्शक मैं थी

प्राणों की थी प्राण ह्रदय की

सोचो तो, हर्षक मैं थी।


मैं थी उज्ज्वल स्फूर्ति, पूर्ति

थी प्यारी अभिलाषाओं की

मैं ही तो थी मूर्ति तुम्हारी

बड़ी-बड़ी आशाओं की।


आओ चलो, कहाँ जाओगे

मुझे अकेली छोड़, सखे!

बंधे हुए हो ह्रदय-पाश में

नहीं सकोगे तोड़, सखे!

वीरों का कैसा हो वसंत ~ Subhadra Kumari Chauhan poems

आ रही हिमालय से पुकार
है उदधि गरजता बार बार
प्राची पश्चिम भू नभ अपार
सब पूछ रहें हैं दिग-दिगन्त
वीरों का कैसा हो वसंत

फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुंचा अनंग
वधु वसुधा पुलकित अंग अंग
है वीर देश में किन्तु कंत
वीरों का कैसा हो वसंत

भर रही कोकिला इधर तान
मारू बाजे पर उधर गान
है रंग और रण का विधान
मिलने को आए आदि अंत
वीरों का कैसा हो वसंत

गलबाहें हों या कृपाण
चलचितवन हो या धनुषबाण
हो रसविलास या दलितत्राण
अब यही समस्या है दुरंत
वीरों का कैसा हो वसंत

कह दे अतीत अब मौन त्याग
लंके तुझमें क्यों लगी आग
ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग
बतला अपने अनुभव अनंत
वीरों का कैसा हो वसंत

हल्दीघाटी के शिला खण्ड
ऐ दुर्ग सिंहगढ़ के प्रचंड
राणा ताना का कर घमंड
दो जगा आज स्मृतियां ज्वलंत
वीरों का कैसा हो वसंत

भूषण अथवा कवि चंद नहीं
बिजली भर दे वह छन्द नहीं
है कलम बंधी स्वच्छंद नहीं
फिर हमें बताए कौन हन्त
वीरों का कैसा हो वसंत

राखी की चुनौती ~ Subhadra Kumari Chauhan poems

बहिन आज फूली समाती न मन में।
तड़ित आज फूली समाती न घन में।।
घटा है न झूली समाती गगन में।
लता आज फूली समाती न बन में।।

कही राखियाँ है, चमक है कहीं पर,
कही बूँद है, पुष्प प्यारे खिले हैं।
ये आई है राखी, सुहाई है पूनो,
बधाई उन्हें जिनको भाई मिले हैं।।

मैं हूँ बहिन किन्तु भाई नहीं है।
है राखी सजी पर कलाई नहीं है।।
है भादो घटा किन्तु छाई नहीं है।
नहीं है ख़ुशी पर रुलाई नहीं है।।

मेरा बन्धु माँ की पुकारो को सुनकर-
के तैयार हो जेलखाने गया है।
छिनी है जो स्वाधीनता माँ की उसको
वह जालिम के घर में से लाने गया है।।

मुझे गर्व है किन्तु राखी है सूनी।
वह होता, ख़ुशी तो क्या होती न दूनी?
हम मंगल मनावें, वह तपता है धूनी।
है घायल हृदय, दर्द उठता है ख़ूनी।।

है आती मुझे याद चित्तौर गढ की,
धधकती है दिल में वह जौहर की ज्वाला।
है माता-बहिन रो के उसको बुझाती,
कहो भाई, तुमको भी है कुछ कसाला?।।

है, तो बढ़े हाथ, राखी पड़ी है।
रेशम-सी कोमल नहीं यह कड़ी है।।
अजी देखो लोहे की यह हथकड़ी है।
इसी प्रण को लेकर बहिन यह खड़ी है।।

आते हो भाई ? पुनः पूछती हूँ
कि माता के बन्धन की है लाज तुमको?

तो बन्दी बनो, देखो बन्धन है कैसा,
चुनौती यह राखी की है आज तुमको।।

सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताएं Subhadra Kumari Chauhan poems in hindi -:

झाँसी की रानी की कविता हिंदी साहित्य में सबसे ज्यादा पढ़ी और गाए जाने वाली कविताओं में से एक है. झाँसी की रानी की कविता में 1857 की क्रांति में उनकी भागीदारी के बारे बताया है की कैसे उन्होंने अंग्रेजो से मुकाबला किया था।

झाँसी की रानी की कविता हिंदी साहित्य में सबसे ज्यादा पढ़ी और गाए जाने वाली कविताओं में से एक है. झाँसी की रानी की कविता में 1857 की क्रांति में उनकी भागीदारी के बारे बताया है की कैसे उन्होंने अंग्रेजो से मुकाबला किया था।

कविता हिंदी साहित्य में सबसे अधिक पढ़ी और गाई जाने वाली कविताओं में से एक है। यह और उनकी अन्य कविताएँ, वीरों का कैसा हो बसंत, राखी की चुनौती और विदा, खुलकर स्वतंत्रता आंदोलन की बात करती हैं।

ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने बड़ी संख्या में भारतीय युवाओं को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।

जलियाँवाला बाग में बसंत ~ Subhadra Kumari Chauhan poems

यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।

कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।

परिमल-हीन पराग दाग सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।

ओ, प्रिय ऋतुराज किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना।

वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना,
दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना।

कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें,
भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें।

लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,
तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले।

किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना,
स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना।

कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर,
कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर।

आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं।

कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना,
कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना।

तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर,
शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर।

यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना,
यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।

आराधना ~ Subhadra Kumari Chauhan poems

जब मैं आँगन में पहुँची,
पूजा का थाल सजाए।
शिवजी की तरह दिखे वे,
बैठे थे ध्यान लगाए॥

जिन चरणों के पूजन को
यह हृदय विकल हो जाता।
मैं समझ न पाई, वह भी
है किसका ध्यान लगाता?

मैं सन्मुख ही जा बैठी,
कुछ चिंतित सी घबराई।
यह किसके आराधक हैं,
मन में व्याकुलता छाई॥

मैं इन्हें पूजती निशि-दिन,
ये किसका ध्यान लगाते?
हे विधि! कैसी छलना है,
हैं कैसे दृश्य दिखाते??

टूटी समाधि इतने ही में,
नेत्र उन्होंने खोले।
लख मुझे सामने हँस कर
मीठे स्वर में वे बोले॥

फल गई साधना मेरी,
तुम आईं आज यहाँ पर।
उनकी मंजुल-छाया में
भ्रम रहता भला कहाँ पर॥

अपनी भूलों पर मन यह
जाने कितना पछताया।
संकोच सहित चरणों पर,
जो कुछ था वही चढ़ाया॥

ठुकरा दो या प्यार करो ~ Subhadra Kumari Chauhan poems

देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं

सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं


धूमधाम से साज-बाज से वे मंदिर में आते हैं

मुक्तामणि बहुमुल्य वस्तुऐं लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं


मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लायी

फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आयी


धूप-दीप-नैवेद्य नहीं है झांकी का श्रृंगार नहीं

हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं


कैसे करूँ कीर्तन, मेरे स्वर में है माधुर्य नहीं

मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं


नहीं दान है, नहीं दक्षिणा खाली हाथ चली आयी

पूजा की विधि नहीं जानती, फिर भी नाथ चली आयी


पूजा और पुजापा प्रभुवर इसी पुजारिन को समझो

दान-दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो


मैं उनमत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आयी हूँ

जो कुछ है, वह यही पास है, इसे चढ़ाने आयी हूँ


चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो

यह तो वस्तु तुम्हारी ही है ठुकरा दो या प्यार करो


राखी ~ Subhadra Kumari Chauhan poems

भैया कृष्ण ! भेजती हूँ मैं

राखी अपनी, यह लो आज।

कई बार जिसको भेजा है

सजा-सजाकर नूतन साज।।


लो आओ, भुजदण्ड उठाओ

इस राखी में बँध जाओ।

भरत – भूमि की रजभूमि को

एक बार फिर दिखलाओ।।


वीर चरित्र राजपूतों का

पढ़ती हूँ मैं राजस्थान।

पढ़ते – पढ़ते आँखों में

छा जाता राखी का आख्यान।।


मैंने पढ़ा, शत्रुओं को भी

जब-जब राखी भिजवाई।

रक्षा करने दौड़ पड़ा वह

राखी – बन्द – शत्रु – भाई।।


किन्तु देखना है, यह मेरी

राखी क्या दिखलाती है ।

क्या निस्तेज कलाई पर ही

बँधकर यह रह जाती है।।


देखो भैया, भेज रही हूँ

तुमको-तुमको राखी आज ।

साखी राजस्थान बनाकर

रख लेना राखी की लाज।।


हाथ काँपता, हृदय धड़कता

है मेरी भारी आवाज़।

अब भी चौक-चौक उठता है

जलियाँ का वह गोलन्दाज़।।


यम की सूरत उन पतितों का

पाप भूल जाऊँ कैसे?

अँकित आज हृदय में है

फिर मन को समझाऊँ कैसे?


बहिनें कई सिसकती हैं हा !

सिसक न उनकी मिट पाई ।

लाज गँवाई, ग़ाली पाई

तिस पर गोली भी खाई।।


डर है कहीं न मार्शल-ला का

फिर से पड़ जावे घेरा।

ऐसे समय द्रौपदी-जैसा

कृष्ण ! सहारा है तेरा।।


बोलो, सोच-समझकर बोलो,

क्या राखी बँधवाओगे?

भीर पडेगी, क्या तुम रक्षा

करने दौड़े आओगे?


यदि हाँ तो यह लो मेरी

इस राखी को स्वीकार करो।

आकर भैया, बहिन ‘सुभद्रा’

के कष्टों का भार हरो।।


उपेक्षा ~ Subhadra Kumari Chauhan poems

इस तरह उपेक्षा मेरी,

क्यों करते हो मतवाले

आशा के कितने अंकुर,

मैंने हैं उर में पाले॥


विश्वास-वारि से उनको,

मैंने है सींच बढ़ाए।

निर्मल निकुंज में मन के,

रहती हूँ सदा छिपाए॥


मेरी साँसों की लू से

कुछ आँच न उनमें आए।

मेरे अंतर की ज्वाला

उनको न कभी झुलसाए॥


कितने प्रयत्न से उनको,

मैं हृदय-नीड़ में अपने

बढ़ते लख खुश होती थी,

देखा करती थी सपने॥


इस भांति उपेक्षा मेरी

करके मेरी अवहेला

तुमने आशा की कलियाँ

मसलीं खिलने की बेला॥


मेरा नया बचपन ~ Subhadra Kumari Chauhan poems

बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।

गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥


चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।

कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?


ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?

बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥


किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।

किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया॥


रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।

बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे॥


मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।

झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया॥


दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।

धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे॥


वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।

लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई॥


असहयोग आंदोलन में भाग लेना

1921 में, सुभद्रा कुमारी चौहान और उनके पति महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में शामिल हुए । वह नागपुर में गिरफ्तार होने वाली पहली महिला सत्याग्रही थीं और 1923 और 1942 में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में शामिल होने के कारण उन्हें दो बार जेल भी हुई थी 

सुभद्रा कुमारी चौहान कवियित्री की रचनाएं (Subhadra Kumari Chauhan poems)

उन्होंने तीन कहानी संग्रह लिखे जिनमें बिखरे मोती, उन्मादिनी और सीधे साधे चित्र शामिल हैं। कविता संग्रह में मुकुल, त्रिधारा आदि शामिल हैं।

कहानी संग्रह :

  बिखरे मोती (1932)

उन्मादिनी (1934)

सीधे साधे चित्र (1947)

कविता संग्रह :-

मुकुल

खिलौनेवाला

ये कदम्ब का पेड़

त्रिधारा

सुभद्रा कुमारी चौहान की रचनाएँ (Subhadra Kumari Chauhan Ki Rachnaye In Hindi)

उन्होंने लगभग 88 कविताओं और 46 कहानियों की रचना की। किसी कवि की कोई कविता इतनी अधिक लोकप्रिय हो जाती है कि शेष कवितायें प्रायः गौण होकर रह जाती है। बच्चन की ‘मधुशाला’ और सुभद्रा जी की इस कविता के समय यही हुआ। यदि केवल लोकप्रियता की दृष्टि से ही विस्तार करें तो उनकी कविता पुस्तक ‘मुकुल’ 1930 के छह संस्करण उनके जीवन काल में ही हो जाना कोई सामान्य बात नहीं है। इनका पहला काव्य-संग्रह ‘मुकुल’ 1930 में प्रकाशित हुआ। इनकी चुनी हुई कविताएँ ‘त्रिधारा’ में प्रकाशित हुई हैं। ‘झाँसी की रानी’ इनकी बहुचर्चित रचना है। राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भागीदारी और जेल यात्रा के बाद भी उनके तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हुए-

  1. बिखरे मोती (1932 )
  2. उन्मादिनी (1934)
  3. सीधे-सादे चित्र (1947 )

सुभद्रा कुमारी चौहान की रचनाएँ:

  • झांसी की रानी
  • मेरा नया बचपन
  • जलियाँवाला बाग में बसंत साध
  • यह कदम्ब का पेड़
  • ठुकरा दो या प्यार करो कोयल
  • पानी और धूप
  • वीरों का कैसा हो वसंत
  • खिलौनेवाला
  • उल्लास
  • झिलमिल तारे
  • मधुमय प्याली
  • मेरा जीवन
  • झाँसी की रानी की समाधि पर
  • इसका रोना
  • नीम
  • मुरझाया फूल
  • फूल के प्रति
  • चलते समय
  • कलह-कारण
  • मेरे पथिक
  • जीवन-फूल
  • भ्रम
  • समर्पण
  • चिंता
  • प्रियतम से
  • प्रथम दर्शन
  • परिचय
  • अनोखा दान
  • उपेक्षा तुम
  • व्याकुल चाह
  • आराधना
  • पूछो
  • मेरा गीत
  • वेदना
  • विदा
  • प्रतीक्षा
  • विजयी मयूर
  • स्वदेश के प्रति बिदाई
  • प्रभु तुम मेरे मन की जानो
  • बालिका का परिचय
  • स्मृतियाँ
  • सभा का खेल

सुभद्रा कुमारी चौहान की लोकप्रिय काविताओं का संग्रह (Poems of subhadra kumari chauhan)

  • खिलोने वाला
  • झाँसी की रानी
  • यह कदंब का पेड़
  • त्रिधारा,
  • पूरी तरवा से छोडो
  • एक माँ की बेबसी
  • मुकुल (1930)
  • बिखरे मोती (1932)
  • सीधे-सादे चित्र (1946)
  • मेरा नया बचपन (1946)

सुभद्रा कुमारी चौहान रचनाओं की विशेषता

सुभद्रा कुमारी चौहान ने अपनी कविताये ,कहानियाँ और रचनाओं को बहुत ही आसान शब्दो में लिखा था । उन्होंने वीर कविताओं के अलावा बच्चों के लिए कविताएँ भी लिखीं। उन्होंने मध्यम वर्ग के जीवन पर कुछ बड़ी कहानियाँ भी लिखीं। सुभद्रा ने अपनी लेखन में हिंदी खड़ीबोली का इस्तेमाल किया था।

सुभद्रा कुमारी चौहान की मृत्यु ( Subhadra Kumari Chauhan Death )

15 फरवरी, 1948 को कलबोडी (सिवनी, एमपी) के पास एक कार दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई। उनके नाम पर एक भारतीय तटरक्षक जहाज का नाम रखा गया है। मध्यप्रदेश सरकार द्वारा जबलपुर नगर निगम कार्यालय के सामने सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रतिमा स्थापित की गयी है.

FAQ

सुभद्रा कुमारी चौहान कौन है ?

सुभद्रा कुमारी चौहान एक बहुत ही प्रसिद्द कवयित्री थी

सुभद्रा कुमारी चौहान की मृत्यु कब हुईं ?

15 फरवरी,1948 को एक कार दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई

सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता कौन है ?

उनकी कविताओं में ‘मुकुल’, कहानी संग्रह ‘बिखरे मोती’, ‘सीधे-सादे चित्र और ‘चित्रारा आदि प्रसिद्द है

सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म कब हुआ था ?

सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त, 1904 में उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले के निहालपुर गाँव में हुआ था । ।

सुभद्रा कुमारी चौहान के पति का नाम क्या था ?

सुभद्रा कुमारी चौहान के पति का नाम ठाकुर लक्ष्मण सिंह चौहान था

सुभद्रा कुमारी चौहान की सबसे चर्चित कविता कौन सी है ?

सुभद्रा कुमारी चौहान की सबसे चर्चित कविता ”झाँसी की रानी” है?

मेरी प्यारी हिंदी कविता की कवयित्री का क्या नाम है ?

मेरी प्यारी हिंदी कविता की कवयित्री का नाम सुभद्रा कुमारी चौहान है

सुभद्रा कुमारी चौहान की रचनाएं की क्या 

  • सुभद्रा कुमारी का जन्म कहाँ हुआ?

    उत्तरप्रदेश के इलाहाबाद जिले के निहालपुर गाँव में

  • सुभद्रा कुमारी चौहान की मृत्यु कब हुई थी?

    15 फ़रवरी 1948 में

  • सुभद्रा कुमारी चौहान की मृत्यु कैसे हुई?

    नागपुर से जबलपुर जाते समय मध्यप्रदेश के सिवनी के पास हुए कार एक्सीडेंट में

  • बिखरे मोती के रचयिता कौन है?

    सुभद्रा कुमारी चौहान

ठह

 दो या प्यार करो ~ Subhadra Kumari Chauhan poems

देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं
सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं

धूमधाम से साज-बाज से वे मंदिर में आते हैं
मुक्तामणि बहुमुल्य वस्तुऐं लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं

मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लायी
फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आयी

धूप-दीप-नैवेद्य नहीं है झांकी का श्रृंगार नहीं
हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं

कैसे करूँ कीर्तन, मेरे स्वर में है माधुर्य नहीं
मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं

नहीं दान है, नहीं दक्षिणा खाली हाथ चली आयी
पूजा की विधि नहीं जानती, फिर भी नाथ चली आयी

पूजा और पुजापा प्रभुवर इसी पुजारिन को समझो
दान-दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो

मैं उनमत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आयी हूँ
जो कुछ है, वह यही पास है, इसे चढ़ाने आयी हूँ

चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो
यह तो वस्तु तुम्हारी ही है ठुकरा दो या प्यार करो

राखी ~ Subhadra Kumari Chauhan poems

भैया कृष्ण ! भेजती हूँ मैं
राखी अपनी, यह लो आज।
कई बार जिसको भेजा है
सजा-सजाकर नूतन साज।।

लो आओ, भुजदण्ड उठाओ
इस राखी में बँध जाओ।
भरत – भूमि की रजभूमि को
एक बार फिर दिखलाओ।।

वीर चरित्र राजपूतों का
पढ़ती हूँ मैं राजस्थान।
पढ़ते – पढ़ते आँखों में
छा जाता राखी का आख्यान।।

मैंने पढ़ा, शत्रुओं को भी
जब-जब राखी भिजवाई।
रक्षा करने दौड़ पड़ा वह
राखी – बन्द – शत्रु – भाई।।

किन्तु देखना है, यह मेरी
राखी क्या दिखलाती है ।
क्या निस्तेज कलाई पर ही
बँधकर यह रह जाती है।।

देखो भैया, भेज रही हूँ
तुमको-तुमको राखी आज ।
साखी राजस्थान बनाकर
रख लेना राखी की लाज।।

हाथ काँपता, हृदय धड़कता
है मेरी भारी आवाज़।
अब भी चौक-चौक उठता है
जलियाँ का वह गोलन्दाज़।।

यम की सूरत उन पतितों का
पाप भूल जाऊँ कैसे?
अँकित आज हृदय में है
फिर मन को समझाऊँ कैसे?

बहिनें कई सिसकती हैं हा !
सिसक न उनकी मिट पाई ।
लाज गँवाई, ग़ाली पाई
तिस पर गोली भी खाई।।

डर है कहीं न मार्शल-ला का
फिर से पड़ जावे घेरा।
ऐसे समय द्रौपदी-जैसा
कृष्ण ! सहारा है तेरा।।

बोलो, सोच-समझकर बोलो,
क्या राखी बँधवाओगे?
भीर पडेगी, क्या तुम रक्षा
करने दौड़े आओगे?

यदि हाँ तो यह लो मेरी
इस राखी को स्वीकार करो।
आकर भैया, बहिन ‘सुभद्रा’
के कष्टों का भार हरो।।

उपेक्षा ~ Subhadra Kumari Chauhan poems

इस तरह उपेक्षा मेरी,
क्यों करते हो मतवाले
आशा के कितने अंकुर,
मैंने हैं उर में पाले॥

विश्वास-वारि से उनको,
मैंने है सींच बढ़ाए।
निर्मल निकुंज में मन के,
रहती हूँ सदा छिपाए॥

मेरी साँसों की लू से
कुछ आँच न उनमें आए।
मेरे अंतर की ज्वाला
उनको न कभी झुलसाए॥

कितने प्रयत्न से उनको,
मैं हृदय-नीड़ में अपने
बढ़ते लख खुश होती थी,
देखा करती थी सपने॥

इस भांति उपेक्षा मेरी
करके मेरी अवहेला
तुमने आशा की कलियाँ
मसलीं खिलने की बेला॥

मेरा नया बचपन ~ Subhadra Kumari Chauhan poems

बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।
गया ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥

चिंता-रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।
कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद?

ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?
बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥

किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।
किलकारी किल्लोल मचाकर सूना घर आबाद किया॥

रोना और मचल जाना भी क्या आनंद दिखाते थे।
बड़े-बड़े मोती-से आँसू जयमाला पहनाते थे॥

मैं रोई, माँ काम छोड़कर आईं, मुझको उठा लिया।
झाड़-पोंछ कर चूम-चूम कर गीले गालों को सुखा दिया॥

दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।
धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे॥

वह सुख का साम्राज्य छोड़कर मैं मतवाली बड़ी हुई।

लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई॥

 चौहान की रचनाओ में राष्ट्रीय आंदोलन, स्त्रियों की स्वाधीनता, जातियों का उत्थान आदि का वर्णन था।



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